लोहदा नाला – भारत की सबसे प्राचीन मूर्ति (मातृ देवी)
लोहदा नाला – भारत की सबसे प्राचीन मूर्ति (मातृ देवी)
🦴 परिचय: एक हड्डी का टुकड़ा जो देवी बन गया
बेलन घाटी में मानव सभ्यता के विकास की कहानी सिर्फ औजारों और चावल तक सीमित नहीं है। यहाँ के लोगों के पास कला, कल्पना और आस्था भी थी। इसका सबसे अनोखा प्रमाण लोहदा नाला (Lohda Nala) नामक स्थान से मिला है – यहाँ उत्खनन में हड्डी की बनी एक स्त्री मूर्ति प्राप्त हुई, जो लगभग 17,000 वर्ष पुरानी है। यह भारत में अब तक मिली सबसे प्राचीन मूर्तिकला है – यूरोप की प्रसिद्ध 'विलेंडॉर्फ की वीनस' (लगभग 25,000 ईसा पूर्व) के समकक्ष, लेकिन अपने आप में अद्वितीय।
इस ब्लॉग पोस्ट में हम जानेंगे कि यह मूर्ति कैसे मिली, यह किसका प्रतीक है, बेलन घाटी के लोग किसकी पूजा करते थे, और यह खोज भारतीय कला के इतिहास को किस प्रकार बदल देती है।
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🗺️ लोहदा नाला कहाँ है?
लोहदा नाला, बेलन घाटी के मिर्ज़ापुर जिले में, सोन नदी की एक छोटी सहायक नाली है। यह स्थल प्रयागराज से लगभग 80 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में, कैमूर पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। 1970 के दशक के अंत में प्रोफेसर जी. आर. शर्मा की टीम ने यहाँ खुदाई की, जब उन्हें उच्च पुरापाषाण (Upper Paleolithic) काल की परतों में कुछ असामान्य दिखा – एक छोटी, नक्काशीदार हड्डी।
लोहदा नाला केवल मूर्ति के लिए ही नहीं, बल्कि पत्थर के औजारों की एक विशाल 'फैक्ट्री' के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ हजारों की संख्या में हाथकुल्हाड़ी, छुरे, और माइक्रोलिथ मिले हैं, साथ ही अर्ध-निर्मित औजार और कोर भी – यह दिखाता है कि यह क्षेत्र उपकरण निर्माण का एक प्रमुख केंद्र था। लेकिन मूर्ति ने इस स्थल को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई।
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🔍 मूर्ति का विवरण: आकार, सामग्री और शैली
यह मूर्ति हड्डी (संभवतः हिरण या सांड की लंबी हड्डी) से बनाई गई है। इसकी लंबाई मात्र 6.2 सेमी है – यानी लगभग अँगूठे के बराबर। फिर भी इसमें अद्भुत विस्तार है:
· सिर: गोल, बिना चेहरे के विवरण के (केवल एक उभार)। बालों को लहरदार रेखाओं से दिखाया गया है, जो पीछे की ओर गिर रहे हैं।
· गर्दन: छोटी और मोटी।
· स्तन: बहुत उभरे हुए, लगभग अर्धगोलाकार – यह मातृत्व और उर्वरता का प्रतीक है।
· पेट: गोल और फूला हुआ (गर्भावस्था का संकेत)।
· कूल्हे और जांघें: भारी और चौड़े, स्त्री के शरीर के विशिष्ट वक्रों के साथ।
· हाथ और पैर: केवल संकेत मात्र – पूरे नहीं बनाए गए; बाँहें छोटी उभारों के रूप में, पैर एक साथ जुड़े हुए।
· योनि क्षेत्र: एक गहरी नक्काशी द्वारा दर्शाया गया है – यह अत्यंत स्पष्ट है।
शैली: यह अतिरंजित यथार्थवाद (exaggerated realism) है – शरीर के प्रजनन से जुड़े अंगों (स्तन, पेट, कूल्हे, योनि) को बड़ा करके दिखाया गया है, जबकि चेहरा, हाथ और पैर को नगण्य बना दिया गया है। यह ठीक वैसी ही शैली है जैसी यूरोप की ऊपरी पुरापाषाण काल की 'वीनस' मूर्तियों में देखी जाती है। यह संयोग नहीं है – यह दर्शाता है कि विभिन्न महाद्वीपों में मानव मस्तिष्क ने उर्वरा देवी की अवधारणा को लगभग एक ही तरह से चित्रित किया।
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🙏 यह किसकी मूर्ति है? मातृ देवी और उर्वरा पूजा
पुरातत्वविद् और इतिहासकार इस मूर्ति को मातृ देवी (Mother Goddess) का प्रतीक मानते हैं। यह उस विश्वास का प्रतिनिधित्व करती है कि स्त्री ही जीवन की स्रोत है – वह जन्म देती है, दूध पिलाती है, और पृथ्वी की तरह फसल उगाती है। ऐसी मूर्तियाँ अक्सर उर्वरता अनुष्ठानों (fertility rituals) में उपयोग की जाती थीं – संभवतः अच्छी फसल, बच्चों की सुरक्षा, या समुदाय की समृद्धि के लिए प्रार्थना के दौरान।
बेलन घाटी में मातृ देवी की पूजा का यह सबूत बहुत बाद की सिंधु घाटी सभ्यता की मातृ देवी मूर्तियों (जैसे 'पशुपति' नहीं, बल्कि स्त्री मूर्तियाँ, लगभग 3000 ईसा पूर्व) से पहले का है। इससे पता चलता है कि भारत में देवी उपासना की परंपरा कम से कम 20,000 साल पुरानी है – और यह अबाधित रूप से आज तक (दुर्गा, काली, लक्ष्मी के रूप में) जारी है।
इसके अलावा, लोहदा नाला में बैल (bull) की छोटी आकृतियाँ और कुछ अमूर्त नक्काशियाँ (ज्यामितीय पैटर्न) भी मिली हैं। बैल को भी उर्वरता का प्रतीक माना जाता था (पुरुष शक्ति के रूप में)। संभवतः यहाँ द्वंद्वात्मक पूजा थी – मातृ देवी (स्त्री सिद्धांत) और बैल (पुरुष सिद्धांत) दोनों की।
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⏳ काल निर्धारण और महत्व
लोहदा नाला की मूर्ति उच्च पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic) की है, जिसकी रेडियोकार्बन तिथि लगभग 17,000 ईसा पूर्व (19,000 साल पहले) है। यह भारत में कला का सबसे पुराना ज्ञात उदाहरण है – न केवल मूर्तिकला में, बलि किसी भी प्रकार की आलंकारिक (figurative) कला में। इससे पहले भारत में केवल गुफा चित्र (जैसे भीमबेटका, लगभग 30,000 ईसा पूर्व) मिलते थे, लेकिन वे द्वि-आयामी (2D) थे। यह मूर्ति त्रि-आयामी (3D) कला का पहला नमूना है।
इस खोज ने एक पुरानी धारणा को तोड़ा – कि भारत में मूर्तिकला की शुरुआत सिंधु घाटी (लगभग 5000 साल पहले) से हुई। अब हम जानते हैं कि भारतीय कला परंपरा कम से कम 19,000 साल पुरानी है।
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🌍 तुलना: लोहदा नाला की मातृ देवी और विश्व की अन्य प्राचीन मूर्तियाँ
मूर्ति स्थान काल समानता
विलेंडॉर्फ की वीनस ऑस्ट्रिया 25,000 ईसा पूर्व अतिरंजित स्तन, पेट, कूल्हे; चेहरा नहीं
लोहदा नाला की मातृ देवी भारत 17,000 ईसा पूर्व वही शैली, परंतु हड्डी की, छोटी
लेसपुग की वीनस फ्रांस 23,000 ईसा पूर्व सींग से बनी, समान अतिरंजना
माल्टा (साइबेरिया) की मूर्तियाँ रूस 20,000 ईसा पूर्व हड्डी और दाँत से बनी, स्त्री आकृतियाँ
यह तुलना दिखाती है कि उर्वरा देवी की पूजा एक वैश्विक घटना थी – जो होमो सेपियन्स के अफ्रीका से बाहर फैलने के साथ ही विकसित हो गई थी। बेलन घाटी के लोग भी इस वैश्विक परंपरा का हिस्सा थे, लेकिन उन्होंने अपनी स्थानीय सामग्री (हड्डी) और शैली (छोटे आकार, कम विवरण) का उपयोग किया।
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